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Saturday, 27 May 2017

जैसे-जैसे खर्च बढ़ा घटते गए बच्चे छात्रों के स्कूल छोड़ने की सालाना दर 10 फीसदी ,नि:शुल्क शिक्षा, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और मिड-डे मील के अलावा दूध व फल जैसे प्रलोभन भी बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से संचालित विद्यालयों में बच्चों को टिकाये रखने में कारगर नहीं साबित

जैसे-जैसे खर्च बढ़ा घटते गए बच्चे
छात्रों के स्कूल छोड़ने की सालाना दर 10 फीसद

हकीकत

राजीव दीक्षित’ लखनऊ

निश्शुल्क शिक्षा, मुफ्त किताबें, यूनिफॉर्म और मिड-डे मील के अलावा दूध व फल जैसे प्रलोभन भी बेसिक शिक्षा परिषद की ओर से संचालित विद्यालयों में बच्चों को टिकाये रखने में कारगर नहीं साबित हो रहे हैं। बेसिक शिक्षा पर सरकार की ओर से खर्च ज्यों-ज्यों बढ़ रहा है, परिषदीय स्कूलों में बच्चों की संख्या त्यों-त्यों गिर रही है। ों की घटती साख का ही नतीजा है कि वे निजी स्कूलों को अपनी जमीन खोते जा रहे हैं।

कड़वी सच्चाई है कि परिषदीय प्राथमिक स्कूलों में वर्ष 2011-12 में छात्र-छात्रओं का नामांकन 1.46 करोड़ था, वह 2016-17 में घटकर 1.16 करोड़ रह गया है। छात्र नामांकन में गिरावट उच्च प्राथमिक स्कूलों के लिए भी चुनौती बनी हुई है। उच्च प्राथमिक स्कूलों में 2011-12 में जहां 42 लाख बच्चे नामांकित थे, वहीं 2016-17 में उनकी संख्या घटकर 35.38 लाख रह गई है। यह तब है जब इस दरम्यान प्रदेश में न सिर्फ ों की संख्या बढ़ी बल्कि उनमें पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या में भी इजाफा हुआ है। ों में नामांकन के बाद स्कूल छोड़ने वाले बच्चों की सालाना दर 10 प्रतिशत है जो बेसिक शिक्षा के पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करती है।

चंताजनक तथ्य है कि बेसिक शिक्षा पर हर साल अरबों रुपये खर्च करने के बाद भी प्रतिस्पर्धा में निजी स्कूलों से पिछड़ते जा रहे हैं। प्रदेश के निजी स्कूलों में ज्यादा बच्चे पढ़ रहे हैं जबकि ों की तुलना में उनकी संख्या आधी भी नहीं है। सूबे में 1,61,329 हैं जिनमें 1,66,02,729 छात्र नामांकित हैं। उनकी तुलना में प्रदेश में महज 72,341 निजी स्कूल हैं जिनमें विद्यार्थियों की नामांकन संख्या 1,67,06,839 है। जहां ों में छात्रों की संख्या गिरती जा रही है, वहीं निजी स्कूलों में उनकी तादाद में लगातार वृद्धि हो रही है।

पिछले महीने यह मुद्दा प्रदेश में सर्व शिक्षा अभियान की समीक्षा के लिए आये ज्वाइंट रिव्यू मिशन ने बेसिक शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में उठाया था। विधानमंडल के बीते सत्र में पेश की गई भारत के नियंत्रक-महालेखाकार परीक्षक की रिपोर्ट में भी इस पर चिंता जतायी गई थी।

अपर मुख्य सचिव बेसिक शिक्षा राज प्रताप सिंह के मुताबिक स्कूलों में बच्चों की वास्तविक संख्या के निर्धारण के लिए उनका आधार नामांकन कराया जा रहा है। स्कूलों में छात्रों की संख्या कम होने की वजह शिक्षकों की बेतरतीब तैनाती भी है। छात्र संख्या के हिसाब से शिक्षकों की तैनाती के लिए सरकार नई स्थानांतरण नीति लागू करने जा रही है।

प्राथमिक विद्यालय

वर्ष - छात्र नामांकन

2011-12 - 1,46,29,083

2012-13 - 1,35,11,799

2013-14 - 1,30,53,796

2014-15 - 1,28,49,789

2015-16 - 1,25,47,860

2016-17 - 1,16,93,424

उच्च प्राथमिक विद्यालय

वर्ष - छात्र नामांकन

2011-12 - 42 लाख

2012-13 - 41 लाख

2013-14 - 40 लाख

2014-15 - 39 लाख

2015-16 - 37 लाख

2016-17 - 35.38 लाख

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