कई शिक्षक पाठ्यपुस्तकों के अध्याय भी नहीं बता सकेपुरस्कार की चाहत में इंटरव्यू के दौरान कुछ शिक्षक पाठ्य पुस्तकों के पहले पांच अध्याय नहीं बता पाए

June 19, 2017

कई शिक्षक पाठ्यपुस्तकों के अध्याय भी नहीं बता सके

पुरस्कार की चाहत में इंटरव्यू के दौरान कुछ शिक्षक पाठ्य पुस्तकों के पहले पांच अध्याय नहीं बता पाए

राजीव दीक्षित, लखनऊ : पुरस्कार की चाहत में इंटरव्यू के दौरान कुछ शिक्षक पाठ्य पुस्तकों के पहले पांच अध्याय नहीं बता पाए। परिषदीय विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली किताबों में शुरुआत में लर्निंग इंडीकेटर्स का जिक्र होता है। इसमें बताया जाता है कि किसी कक्षा में एक निश्चित समयावधि तक बच्चों को पढ़ाने के बाद उन्हें क्या आना चाहिए।

इंटरव्यू के लिए आए कई शिक्षकों से जब लर्निंग इंडीकेटर्स के बारे में पूछा गया तो वे शून्य में ताकने लगे। एक शिक्षक से जब उनके स्कूल के बच्चों की संख्या और सभी शिक्षकों को मिलने वाले कुल वेतन के आधार पर प्रति बच्चा खर्च बताने को कहा गया तो कागज-कलम लेकर काफी देर तक मशक्कत करने के बाद उन्होंने इसमें असमर्थता जताई। एक अन्य महिला शिक्षक से जब यही गणित लगाने के लिए कहा गया तो उन्होंने बड़े धड़ाके से बोर्ड के सदस्यों से कहा कि मैं तो उर्दू पढ़ाती हूं, गणित से मेरा क्या लेना-देना। कई

शिक्षकों से साक्षात्कार के दौरान यह भी सवाल हुआ कि आप स्वयं को इन पुरस्कारों के लिए क्यों योग्य समझते हैं? ज्यादातर शिक्षकों का जवाब था कि सर, समय से स्कूल आता हूं और बच्चों को पढ़ाने में लगा रहता हूं। इंटरव्यू देकर कमरे से बाहर निकलने वाले शिक्षक खुद ही एक-दूसरे से अपने अनुभव साझा कर रहे थे।

बजट 41 हजार करोड़ : यह तस्वीर है सूबे में बेसिक शिक्षा की बदहाली की जिसके लिए सरकार ने पिछले वित्तीय वर्ष में 41 हजार करोड़ का बजट आवंटित किया था। इस बजट में तकरीबन 24 हजार करोड़ रुपये शिक्षकों के वेतन पर खर्च किए गए। 

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