इलाहाबाद:अंग्रेजी पढ़ी व पढ़ाई हिन्दी में कलम चलाई- धर्मेश अवस्थी की कलम से विशेष कवरेज। 🎯शिक्षक बनने के लिए अंग्रेजी में एमए। 🎯इंग्लिश बोलने का डिप्लोमा, बीएड किया। 🎯सरकारी सेवा में आकर मातृभाषा के प्रति जगा प्रेम, अब हिन्दी सेवा में जुटे।

September 14, 2017



अंग्रेजी पढ़ी व पढ़ाई हिन्दी में कलम चलाई- धर्मेश अवस्थी की कलम से विशेष कवरेज।
🎯शिक्षक बनने के लिए अंग्रेजी में एमए।
🎯इंग्लिश बोलने का डिप्लोमा, बीएड किया। 🎯सरकारी सेवा में आकर मातृभाषा के प्रति जगा प्रेम, अब हिन्दी सेवा में जुटे।

धर्मेश अवस्थी
राज्य ब्यूरो इलाहाबाद। जब गांवों में अंग्रेजी से परास्नातक खोजने पर मिलते थे, उस समय विजय प्रसाद त्रिपाठी ने यह मुकाम हासिल कर साथी युवाओं के बीच मिसाल बने। जिस स्कूल में पढ़े उसी में अंशकालिक शिक्षक बनकर छात्र-छात्रओं को अंग्रेजी पढ़ाया। गांव के युवा अंग्रेजी बोलने में हिचकिचाते हैं, इसे दूर करने को स्पोकेन इंग्लिश का डिप्लोमा कोर्स किया। अंग्रेजी का शिक्षक बनने की चाह में बीएड का प्रशिक्षण भी लिया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनका चयन उप्र सचिवालय में प्रवर सहायक के रूप में हुआ। सरकारी सेवा में आकर मातृभाषा के प्रति ऐसा प्रेम जगा कि उनकी पहचान बदलकर हंिदूी सेवी की हो गई है।
🎯रोजगार पाने को अंग्रेजी की पढ़ाई : इलाहाबाद के होलागढ़ ब्लाक के अकोढ़ी गांव निवासी विजय के माता-पिता पढ़े-लिखे नहीं थे। ऐसे में घर चलाने के लिए रोजगार पाने की ख्वाहिश में 1970 के दशक में अंग्रेजी की पढ़ाई की। 1979 में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से बीएड किया तो संस्कृत के प्रति रुझान हुआ और 1981 में साहित्याचार्य किया। महज इंटर तक हंिदूी पढ़ने वाले शख्स को यह पढ़ाई हंिदूी की ओर खींच ले गई। मुलायम सिंह का आदेश बना मददगार। विजय ने उप्र सचिवालय के लिए वैसे तो 1983 में परीक्षा दी, लेकिन उसका परिणाम 1990 में जारी हुआ। जब वह सचिवालय में तैनात हुए उस समय मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने सभी कामकाज हंिदूी में करने का आदेश जारी किया, तब केवल केंद्र सरकार को भेजे जाने वाले पत्र व न्यायालय प्रकरणों का जवाब अंग्रेजी में जाता था। इससे हंिदूी का माहौल बना। पुस्तकें और हंिदूी सेवी सम्मान : विजय बताते हैं कि सरकारी नौकरी के दौरान ही राष्ट्रवाद से ओतप्रोत रचनाएं करने लगे और 2010 में ‘इदम् राष्ट्राय’ कविता संग्रह का प्रकाशन हुआ। 2015 में ‘कलम न मानेगी’ गीत संग्रह का प्रकाशन हुआ। दोहा, सवैया और घनाक्षरी छंदों पर विजय छंदावली जल्द ही प्रकाशित होने जा रही है और एक गीत संग्रह भी इलाहाबाद से प्रकाशित होने को है। उन्हें कविता संग्रह के लिए उप्र भाषा विभाग से जयशंकर प्रसाद पुरस्कार तो गीत संग्रह के लिए यहीं से गया प्रसाद शुक्ल सनेही सम्मान मिला। इस समय वह लखनऊ में रह रहे हैं।हंिदूी अब कृपा की मोहताज नहीं 1उप्र सचिवालय से अनुसचिव पद से 31 अगस्त 2016 को सेवानिवृत्त हो चुके विजय कहते हैं कि हंिदूी अब विश्वभर में संवाद की भाषा बन चुकी है वह सरकार की कृपा की मोहताज नहीं रही। दक्षिण भारत में लोग इसे ठीक से समझते हैं और कई देशों में हंिदूी बोलने की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इसे केवल रोजगार की भाषा बना दिया जाए तो प्रसार और तेजी से होगा। उन्होंने गुनगुनाया - संस्कृत जिसकी माता है, जो संस्कृति की भाषा है, उसी नागरी से भारत को निज गौरव की आशा है।


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